Saturday, January 21, 2012

नेता में बन जाऊ

माँ मुझे कुछ पैसे दे दो

माँ मुझे कुछ पैसे दे दो
में कुरता खादी का सिल्वाऊ
कुरता पहनू बदन पर अपने
गांधी टोपी सर पे मेरे सजाऊ
नित नए में करू घोटाले
कारनामा कुछ ऐसा दिखलाऊ
कलमाड़ी, राजा, लालू जैसा
नेता में बन जाऊ
कभी खाऊ में चारा,
और कभी टू जी में चाट कर जाऊ
देश बेच कर दुश्मन को अपने
नौ लक्खा हार तुझे पहनाऊ
माँ को आया गुस्सा और वो तब बोली
सुने ले मेरे लाल
तेरे जैसे कपूत को पाकर
हो गई में कंगाल
हो गई में कंगाल अब सुनी गोद भी में हो जाऊ
अपने इन्ही हाथो से क्यों न ज़हर तुझे पिलाऊ
अपनी ममता का गला घोंट दू
माँ भारत को मैं पहले बचाऊ
...............
रवि कुमार "रवि"

6 comments:

  1. bahi kyaa baat hai, tabiyat hari hogyi

    dhanyabad

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  2. Ravi, picture added by moderator suits your poem, if you wish i can remove thqat picture
    tumhari kavita ke dard ko log samajhane lage hai-gteat job- keep it up

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    1. this picture is very nice...thanks for this pic.

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  3. again you rock kaviraj

    welldone

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